फिर तुम क्यों नाराज़ खुदी सेएक सरल मुसकान बिखेरो ,
जगती के सुंदर जीवन सेसुंदर नयनों को न फेरो.
ये संसार देव नगर है ,जिसमें मिलती कई डगर हैं .
रुके -खड़े क्यों !क्या उलझन है !
अपने कदम बढ़ा कर देखो,
साथ चलेंगे कितने पग फिरएक बार अपनाकर देखो
जीवन में कैसी देरी है ,
जीवन में कैसी जल्दी है ,
जीवन में क्या खो जाना है ,
जीवन में क्या मिल जाना है ,
मेरी आँखों से तुम देखो जग जाना और पहचाना है.
नहीं अकेले इस सागर मेंलहर-लहर का मिल जाना है.
मेरे शब्द उठा कर देखोशब्द गीत हर हो जाना है.
सागर अपने मन -दर्पण मेंचाँद समेटे रख सकता है ,
और हवाओं का ये आँचलसुमन झोली में भर सकता है ,

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