Monday, April 12, 2010

फिर तुम क्यों नाराज़ खुदी सेएक सरल मुसकान बिखेरो ,

जगती के सुंदर जीवन सेसुंदर नयनों को न फेरो.

ये संसार देव नगर है ,जिसमें मिलती कई डगर हैं .

रुके -खड़े क्यों !क्या उलझन है !

अपने कदम बढ़ा कर देखो,

साथ चलेंगे कितने पग फिरएक बार अपनाकर देखो

जीवन में कैसी देरी है ,

जीवन में कैसी जल्दी है ,

जीवन में क्या खो जाना है ,

जीवन में क्या मिल जाना है ,

मेरी आँखों से तुम देखो जग जाना और पहचाना है.

नहीं अकेले इस सागर मेंलहर-लहर का मिल जाना है.

मेरे शब्द उठा कर देखोशब्द गीत हर हो जाना है.

सागर अपने मन -दर्पण मेंचाँद समेटे रख सकता है ,

और हवाओं का ये आँचलसुमन झोली में भर सकता है ,

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